Friday

चित्रांश सक्सेना


"तलाश है...." 
 
डाली से गिरे फूल को उठने की आश है।
अपनी तरह सभी को किसी की तलाश है॥

मीलों हैं चले साथ उनके रहों पर इसकदर,
राहों को भी हम जैसे हमसफर की तलाश है।

बन्द आंखों मे तो देखे हैं सच होते हुये सपने,
खुली आंखों को भी सच होते सपने की तलाश है।

शक्ल तो आपके दिल मे भी होगी कोई लेकिन,
तमाम शक्लों मे उस जैसी शक्ल की तलाश है।

करते हैं सभी प्यार यहाँ इस दौर मे अब तो,
पर उस प्यार को जो निभाये उसकी तलाश है।

पत्थरों और काँच के इस खेल मे ‘चित्रांश’,
दिल को भी अपने जैसे किसी की तलाश है।

चित्रांश सक्सेना

मंज़िल की तलाश मे भागते बीत जाती थी ज़िन्दगी,
सुबह से शाम तक मज़ाक मे कट जाती थी ज़िन्दगी।
जब साथ थे तो लगता नही था कि याद आयेगी इतनी
दो घूट दोस्तो के साथ गरम चाय वाली ज़िन्दगी ॥

Monday

चित्रांश सक्सेना


छोटी सी मात को जो हार समझ बैठे हैं,
 अपने हर लक्ष्य को वो ख्वाब मान बैठे हैं।
करेंगे क्या वो ज़िन्दगी के इस सफर मे जो,
राह के रोढ़े को अंजाम समझ बैठे हैं ॥

चित्रांश सक्सेना

दिल है कि ख्वाब इसको सजाने का शौक है,
 बारिश मे भी वो नाव बहाने का शौक है ।
कागज की उस कश्ती का सफर छोटा है लेकिन,
 पल भर की खुशी इसको मनाने का शौक है।

Sunday

चित्रांश सक्सेना


ऐ खुदा दुनिया मे खुशी का तू मंज़र कर दे,
ये ना हो तो दुखों को तू यहां से कम कर दे।
जानता हूँ कठिन है ये इस दौर मे फिर भी,
सबकी चादर तू उनके पैरों के बराबर कर दे॥

चित्रांश सक्सेना


वो खुदा भी बडे खेल खेला करता है,
हमेसा फूल को काँटों के साथ रखता है।
राह तो हर तरफ बनाता है लेकिन फिर भी,
जाने क्यू मंज़िलों को हमसे दूर रखता है॥


Tuesday

अदिति प्रसाद


इस बहरूपिया ज़िन्दगी ने मुखोटा लगाना सिखा दिया,
हम तो अच्छे थे बच्चे थे, पता नहीं ये क्या बना दिया,
पर क्या पता था एक दिन इस अनचाहे रंग मे रंग जायेंगे,
हसेंगे होठो से पर बाद मे आँखे नम कर जायेंगे,
पर क्या करें इस ज़िंदगी ने हमे ढोंगी बनना भी सिखा दिया ।


लोग कहते हैं रोना अच्छी बात नहीं, रोया मत करो,
मेरी बिनती है उनसे कि ये हक मुझसे छीना मत करो,
क्योकि जब....
अपने इल्ज़ाम लगाते हैं, आंसू उन इल्ज़ामो को मन से धो देते हैं,
लोग दुख देते हैं, आंसू उन दुखों को कम कर देते हैं ।
तो आप ही बतओ क्यो ना नम करू मैं अपनी पलकों को ?


कभी मतलबी होने का मतलब नहीं पता था,
आज वही मतलबी ज़िन्दगी जिये जा रही हू,
आज निभती है तो मतलब से टूटी है तो मतलब है,
अपना असतित्व ही पीछे छूटता जा रहा हो जैसे ।


अकेलेपन और तन्हाइयों का साथ अब अच्छा लगने लगा है,
लोगों के बीच मे तन्हा-तन्हा सा लगने लगा है,
काश ज़िन्दगी एक ऐसा मोड लाये जिसमे हम अपने असली रूप मे आयें ।
और फिर से वही अच्छे से सच्चे से बच्चे बन जायें ।
और फिर से वही अच्छे से सच्चे से बच्चे बन जायें ।।

Is poetry realy live in todays fast running life?

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