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Friday

डाँ. कुंअर बेचैन...

कुछ और शेर...

दो चार बार हम कभी हस हँसा लिए,
सारे
जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए |
रहते हमारे पास तो ये टूटते ज़रूर,
अच्छा
किया जो आपने सपने चुरा लिए ||

दुनिया ने मुझपे फेके थे पत्थर जो बेहिसाब |
मेने उन्ही को जोड़ के कोई घर बना लिए ||

कहाँ वो नई गहिरायाँ हसने हँसाने में,
मिलेंगी जो किसी के साथ दो आंसू बहने में |
तुम आये तो खुशी आई लेकिन हसूं अभी केसे ,
कुछ देर तो लगती है रो कर मुस्कराने में ||

Monday

डाँ. कुंअर बेचैन...

अंगुलियाँ थाम के...
अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आंखों से
मैने खुद रो के बहुत देर हंसाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे मुझसे बहुत दूर गयी
वो ग़जल मैने बड़े शौक से गाया था जिसे

मुझसे नाराज़ है इक शख्स़ का नकली चेहरा
धूप में आइना इक रोज़ दिखाया था जिसे

अब बड़ा हो के मेरे सर पे चढ़ा आता है
अपने कांधे पे कुंअर हंस के बिठाया था जिसे

Is poetry realy live in todays fast running life?

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