Monday

तरुण शर्मा

"तुम "

इस और जाता कभी उस और जाता
और चलते-चलते अचानक ही रुक जाता 
कोई जब पूछता सवाल मुझसे 
मैं कुछ नहीं कह पाता 
हर कदम पर मैं खुद को 
क्यों इतना असहाय पता हूँ
इस सवाल का जबाब शायद हो "तुम "

"तुम " जबसे मेरी जिन्दगी मैं हो  आई 
मेरे साथ रहती है तुमारी परछाई
जब  भी मैं अकेला होता हूँ 
तुमारे ही खयालो मैं खोता हूँ 
तुम मुझसे नहीं कुछ कहती हो 
पर एक अहसास बन कर 
मेरे साथ रहती हो
तुम मुझसे हमेशा दूर रहती हो
लेकिन ना जाने क्यों ऐसा लगता है
की आँखों ही आँखों मैं मुझसे कुछ कहती हो 
क्या कर दिया ये तुमने की 
मैं हर पल बेचैन रहता हूँ 
दिन रात ये दर्द हमेशा सहता हूँ
क्यों है मुझे तुम से इतना प्यार
की हर जीत के बाद भी महसूस होती है
अपनी हार
समझ मे मेरे नहीं कुछ आता है 
ये मेरे तुमारे बीच क्या नाता है 
की मेरे मन मे उठता है ये भावनाओ का भंवर 
और मैं किसी से कुछ कह भी नहीं सकता मगर
पर शायद तुमारी आंखें कहती हैं मुझसे 
की मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ 
पर इस समाज से डरती हूँ
और ये युक्ति की समाज खिलाफ है इस प्यार के 
मेरी समज से बाहर है 
प्यार को त्याग और बलिदान से सींचा जाता है 
ये एक ऐसी डोर है जिसे साथ मिलके खीचा जाता है 
समाज की निरी कुरीतियों को ठुकराते हूँए 
ऐसे समाज को तिरस्कार है
जो कृष्ण को तो पूजते हैं 
और प्यार से इंकार है 
रहती है मुझे हमेशा एक आस 
की तुम लौटोगी एक दिन मेरे पास
और हाँ कहोगी की मुझे भी है तुम से प्यार 
तुम ही ने तो झीना है मेरे 
दिल का करार
पर हाँ शायद ये है एक कल्पना 
और एक मैं था जो मान बैठा था 
तुम्हे अपना
जानता हूँ तुम मुझसे दूर जाओगी
और ये साथ छूटेगा एक दिन
ये प्यारा सा अहसास टूटेगा एक दिन 
लेकिन तुम याद बन कर हमेशा 
मेरे मन मे रहोगी 
मैं तुम से ऐसे ही बात करता रहूँगा 
और तुम तब भी कुछ ना कहोगी
पर रखना ये याद हमेशा 
की एक लड़का था 
जो , हमेसा मुस्कुराता था 
और  कुछ गुनगुनाता था
जो करता था तुम्हें बहूँत प्यार
और करता रहा था तुम्हारा इंतजार 
वो हमेशा तुम से इतना ही प्यार करेगा
पर अब कभी कुछ नही कहेगा
कोई शिकायत नहीं तुमसे 
बस प्यार ही और हमेशा रहेगा ...........हमेशा रहेगा

Wednesday

सारांश सक्सेना

भूलेंगे न कभी तुम्हे जो तुमने पल दिए ,
यूँ दोस्ती का वास्ता देकर वो चल दिए ।

जब जब चला साथ तू लगता था सब नया,
जब से गया है दूर तो लगता है सब गया,
रखेंगे साथ हम सभी आंसू काज़ल दीये,
यूँ दोस्ती का वास्ता .............................

जब देखता था दिल तुझे होती थी इक ख़ुशी,
अब उस ख़ुशी के दौर ने कर ली है खुदखुशी,
मेरे उलझे से सवालों के तूने हंस के हल दिए,
यूँ दोस्ती का वास्ता .......................

Friday

चित्रांश सक्सेना

हमने पत्थर को कभी देवता नही माना,
खुदा कहते हैं किसको ये तक नही जाना ।
अपनी किस्मत से इतना प्यार मिला हमको,
कि माँ बाप से ऊपर किसी को नही माना ।।

चित्रांश सक्सेना

कल तो बस एक छोटा सा अल्फाज़ ही है,
जो कुछ भी है वो तो हमारा आज ही है ।
बाटोगे प्यार या खुशी तो कुछ नहीं जायेगा,
वरना गम देना तो जमाने का काज ही है ॥

चित्रांश सक्सेना

झूट बोला था जब, नजरें मिलायी नही ।
आज बोला जो सच नजरें उठाई नहीं ।।

पास जब भी गये दूर से ही रहे,
कुछ भी कहने की हिम्मत जुटाई नहीं।

गलत थे हम ये जानते थे सभी,
पर किसी ने भी गलती बताई नहीं।

दूर थी अपनी मंजिल पता था हमें,
फिर भी दूरी किसी को दिखाई नहीं।

गुज़ारिश तो कश्तियों ने समन्दर से भी की,
पर समन्दर ने किसी की भी मानी नहीं।

जाने क्या क्या सुने इस जमाने से हम,
फिर भी नफरत की फसलें उगाई नहीं।

चित्रांश सक्सेना

कभी कभी मैं सोचता हूँ ख्वाब क्यू देखू,
जो मेरे बस मे नही है वो बात क्यू देखू।
ये तो फितरत है आईने की टूट कर चुभना,
तो उस आईने को फेक कर क्यू देखू ॥

चित्रांश सक्सेना

वो दोस्त ही है जो कुछ नही कहता है,
और जब कहता है तो चुप नही रहता है।
तारे तो आसमा मे बहुत से होते हैं,
पर हमेशा चाँद उनका एक ही रहता है॥

Is poetry realy live in todays fast running life?

Extension Factory Builder