"ख्वाब हैं कि...."
ख्वाब भी अब नींदों मे आते हैं नही,
देख कर अब वो मुस्कराते हैं नहीं ।
मुद्दतें हो गयीं हैं
रात सोये हुये,
ख्वाब हैं कि आंचल बिछाते हैं नहीं ।
खुद से करते रहते
हैं बातें यूँहीं,
ख्वाब हैं कि
बातें बनाते हैं नहीं ।
थक गये हैं हिचकियाँ
लेते हुये,
ख्वाब हैं कि
पानी पिलाते हैं नहीं ।
झूठे लोगों का तमाशा
देख कर,
ख्वाब भी अब सच दिखाते हैं नहीं ।


